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गुरुवार, 19 जुलाई 2018

रविन्द्रनाथ टैगोर जी का उपन्यास "गोरा"


रविन्द्रनाथ  टैगोर  जी का उपन्यास "गोरा"

गोरा: Gora (A Novel by Rabindranath Tagore)



गौर  मोहन  बाबू (गोरा ) जो  बचपन से  ही इस  भ्रम  में  जीता  है  की  वो  एक हिन्दू ब्राह्मण  हैं,  लेकिन जब उसे पता चलता हैं की जिन्हें वो  माता  पिता  मानकर  हिन्दू होने  पर  गर्व  करता रहा  वें  उसके माता  पिता  है  ही  नहीं  और  वो  किसी आयरिश  व्यक्ति  की  संतान  हैं  जिसके  पिता उसके जन्म से  पहले  ही  गुजर  गये और  माँ उसको जन्म देते ही। ..... तब गोरा  का  समाज  को देखने का  नज़रिया कैसे बदलता  हैं. ......

जानने के लिये  पढ़े - रविन्द्रनाथ  टैगोर  जी का उपन्यास "गोरा"। ..... मेरे  ख्याल  से  गोरा  उपन्यास  के  बारे  में  सिर्फ  इतना कहना काफी न होगा। ..... इस  उपन्यास  में  परिवार  भी हैं ,दोस्ती  भी  है ,प्यार भी हैं  और  हमेशा दूसरो  की  जिंदगी  में झाँकने वाले किरदार  भी है..  

जात,पात धर्म ,समाज  का भी  व्याख्यान  रविन्द्रनाथ टैगोर ने  अपने इस उपन्यास  में  बख़ूबी किया  हैं..... 
आपको  यह  उपन्यास  अमेज़ॉन  में  मिल  जाएगा। ..... गोरा  उपन्यास  के  और  दिलचस्प  अध्याये  जानने  के लिये नीचे कमेंट  बॉक्स  में  कमेंट  करे...... बाकी  आप  चाहे तो  जरूरी सुझाव  के लिये   सलाह  भी  दे  सकते  है। .. 
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शनिवार, 14 जुलाई 2018

"Filmsandbooks"

किताबे और  किस्से में आप  सब  का स्वागत  हैं.......


दोस्तों ये तो हम सभी जानते है ज़िन्दगी  का कोई भी पड़ाव  हो हम किताबो से रुबारु हो ही  जाते  हैं, फिर चाहे वो बचपन की  "नंदन " हो  या लड़कपन  कि  "हॉफ  गर्ल  फ्रेंड" कभी कहानियों की, दुनिया में  डूबने का मन हो तो  प्रेमचंद्र की कहानियों में गोते लगाते हैं और अगर प्यार में  हो गुलज़ार के संग थोड़ा गुलजार हो जाते हैं और जैसे जैसे वक़्त बदलता हैं हमारी किताबें भी अपना स्वारुप बदल लेती हैं।...



अपने इस ब्लॉग से मैं आपको बताऊँगी की वो कागज की दुनिया आज के डीजिटल युग से कितनी अलग हैं" 

यहाँ मै हर उस किताब के किस्से बताऊँगी जो मैंने पढ़ी हैं और आपको एक बार  फिर कागज़ की उस दुनिया में ले जाने की  कोशिश करुँगी जहाँ एक दोस्त बिन कुछ बोले बहुत कुछ बोल जाता है , और उसी दोस्त को हम बहुत पीछे छोड़ आये हैं ||




जब मैं भटक जाती हुँ तो, 
किताबे मुझे रास्ता दिखाती  है ।
जब  उदास होती हूँ  तो किताबें,
ख़ुशी  बन जाती है।... 

बस  इतना ही रिशता हैं  मेरा  उस  कागज  की दुनिया सें....

अगर  आपको भी  किताबे  पढ़ने  का  शौक है तो जुड़े रहिये किताबे  और किस्से  के   साथ...