लोकप्रिय पोस्ट

रविवार, 12 अगस्त 2018

सेवासदन मुंशीप्रेम चंद


                                                              " सेवासदन मुंशीप्रेम चंद" 

सबसे  पहले  आपसे  बहुत  बहुत  माफ़ी   मांगना  चाऊंगी  जो  बहुत दिनों  से  मेरे  नये  पोस्ट का इंतज़ार  कर  रहे  हैं, और मैं  उन्हें  लगातार इंतज़ार  करवा  रही  हूँ।
दोस्तों आज  हम फ़िर  हाज़िर हुए हैं  अपनी नयी  किताब के  साथ , क़िताबे   और  किस्से  के  कुछ  और  किस्सों  के  साथ   जैसा की आप  सब  जानते  हर  बार  हम  हिंदी  के  महान  लेखकों की  किताबों  की  व्याख्या  करते  हैं  और  आपसे  ये  इच्छा  जाहिर  करते  है  की  आप  भी  उस  पुस्तक  को उसी  रस  और  आनन्द  के  साथ पढ़े  जो आनन्द  मुझे  अपने  नये  पोस्ट  को  लिखने  में  आता  हैं।
 
मैं  किताब  को  पहले  बहुत  ही आनन्द  के साथ  पढ़ती  हूँ  उसके  बाद   ही  आपके  साथ साँझा  करती  हूँ। तो  दोस्तों मेरा  इतना तो हक़  बनता  है  की  आपसे  बोलो  के  मेरे  रिव्यु  पर  अपनी  प्रतिक्रिया  देना  न  भूले , कहाँ ? अरे  भाई  कमेंट  बॉक्स  में  यही  तो  एक जरिया  है  जो  मेरा आपका और  हम  सबका रिश्ता   और  मज़बूत  बनाता  हैं। 
 
ओके , सॉरी  अगेन  आई  नो  यू  आर वेटिंग  फ़ॉर  ओल्ड  बुक  रिव्यु  इन न्यू   स्वाति ' स स्टाइल चालो  अच्छा  अब  बता  ही  देती  हूँ  आज  किस  क़िताब  के  बारे  में  बताऊँगी। . वैसे  ये  मजाक  ही  था  क्योकि  इंतज़ार  की  कोई  बात  ही  नहीं  थी  क्योंकि  हमने तो पोस्ट  का  नाम   ही  ऐसा  रखा  है  की  आपको  जाने  कब  पता  चल  चुका  होगा  और  अभी  आपको  मेरे  ब्लॉग  में  बने  रहने  का भी  यही  कारण  था। .वैसे  अब  इतना समय  रुक  गये हो  तो  दो  मिनट  और  सही।
                                      .

आज  की  किताब का क़िस्सा   है  कहानियों के  लेजेंड  और  कलम  के  सिपाही  मुंशी  प्रेमचंद्र  जी  के  द्वारा  लिखी  गयी  उपन्यास  "सेवासदन " सेवासदन  एक  ऐसी  स्त्री  की कहानी  है  जो  अपने   द्वारा  धिक्कारे  जाने  पर और  उसे  जीवन यापन  का  और  कोई  मार्ग  न मिलने पर वो  एक  वैश्या की  जिंदगी अपनाने में  मजबूर हो  जाती  है। 

वैसे  तो  उसे  उसके  घर  के सामने  रहने  वाली  वैश्या  के कपड़ो  उसके  रहन  सहन  ने  हमेशा ही  प्रभावित  किया  था लेकिन उसने कभी भी ऐसा नहीं सोचा था की एक वक़्त ऐसा भी आयेगा  की उसे मजबूरन वैश्य की जिंदगी जीने के लिये  मजबूर होना पड़ेगा। 

 उसकी  जिंदगी  में  कुछ  ऐसा  हो रहा  था। .. की  उसको  दूर  के  ढोल  सुहावने  लग  रहे  थे  परन्तु  कुछ  चीज़े  बाहर  से  जैसी  दिखती  है  वैसी  होती  नहीं  , इस  बात  का इल्म  उसे  तब  हुआ  जब  वो  उस  पेशे  में  रंग  चुकी  थी, लेकिन  एक  बात  जो  बहुत  ही बेहतरीन रही की  वक़्त  रहते  उसने  खुद  को  बाहर  ही  नहीं  निकाला  अपितु  उसने  वैश्या  की  लड़कियों को  पढ़ाने  और  उनकी  देख  रेख  करने  का  जिम्मा  अपने  सर  पर ले  लिया। ... कहानी  में  बहुत से  उतार  चढ़ाओ  है उस  समये  के समाज  और  लोगो  को  प्रेमचंद्र  जी ने  बखूबी   क़िताब में  उतारा  हैं।
पूरी  कहानी  जानने  के  लिए  पढ़े  "उपन्यास  सेवासदन "और  किताबो  के  और  किस्से  जानने  के  लिये  बने  रहिये  मेरे  यानी  किताबे  और  किस्से  के  संग।

आप इस किताब  को अमेज़न , फ्लिपकार्ट ,गूगल ,प्रतिलिपि एवम  अन्य साइट्स में पढ़ सकते है। 

मेरे द्वारा लिखी गई  कहानियों  को पढ़ने के लिए नीचे दिये लिंक पर क्लिक करे मैंने अपने नये  ब्लॉग को आपकी सुविधा के अनुसार हर तरह की कहानियाँ को लिखने का प्रयास किया हैं एक बार लिंक पर क्लिक जरूर करे -



आज  इस  पोस्ट  के  साथ  एक खुशखबरी  भी  देना  चाहूँगी  की जल्द  ही  मैं  अपने  नये  ब्लॉग  के  साथ  नये  रूप में  मिलूंगी। 


गुरुवार, 19 जुलाई 2018

रविन्द्रनाथ टैगोर जी का उपन्यास "गोरा"


रविन्द्रनाथ  टैगोर  जी का उपन्यास "गोरा"

गोरा: Gora (A Novel by Rabindranath Tagore)



गौर  मोहन  बाबू (गोरा ) जो  बचपन से  ही इस  भ्रम  में  जीता  है  की  वो  एक हिन्दू ब्राह्मण  हैं,  लेकिन जब उसे पता चलता हैं की जिन्हें वो  माता  पिता  मानकर  हिन्दू होने  पर  गर्व  करता रहा  वें  उसके माता  पिता  है  ही  नहीं  और  वो  किसी आयरिश  व्यक्ति  की  संतान  हैं  जिसके  पिता उसके जन्म से  पहले  ही  गुजर  गये और  माँ उसको जन्म देते ही। ..... तब गोरा  का  समाज  को देखने का  नज़रिया कैसे बदलता  हैं. ......

जानने के लिये  पढ़े - रविन्द्रनाथ  टैगोर  जी का उपन्यास "गोरा"। ..... मेरे  ख्याल  से  गोरा  उपन्यास  के  बारे  में  सिर्फ  इतना कहना काफी न होगा। ..... इस  उपन्यास  में  परिवार  भी हैं ,दोस्ती  भी  है ,प्यार भी हैं  और  हमेशा दूसरो  की  जिंदगी  में झाँकने वाले किरदार  भी है..  

जात,पात धर्म ,समाज  का भी  व्याख्यान  रविन्द्रनाथ टैगोर ने  अपने इस उपन्यास  में  बख़ूबी किया  हैं..... 
आपको  यह  उपन्यास  अमेज़ॉन  में  मिल  जाएगा। ..... गोरा  उपन्यास  के  और  दिलचस्प  अध्याये  जानने  के लिये नीचे कमेंट  बॉक्स  में  कमेंट  करे...... बाकी  आप  चाहे तो  जरूरी सुझाव  के लिये   सलाह  भी  दे  सकते  है। .. 
अगर  आपको  मेरी  लेखनी  जरा भी  दिलचस्प  लगती  हो  तो आप  मेरी  लिखी  हुई  कवितायें फेस  बुक  पर  मेरी कविताओं  का  मंच  नाम  से  फेस बुक  पर पढ़  सकते है। 

मेरे द्वारा लिखी गई कहानियों और उपन्यास को पढ़ने के लिये नीचे दिए लिंक पर क्लिक करे -


आप  मुझे  गीत  लिखने  के लिये  व्हाट्स 73175891234  भी  कर  सकते  है और   मेरे  फेस बुक  पेज   lyricist Swati...  जाकर  मेरे  लिखे  गानो  को  देख सकते  है । 

इंस्टाग्राम पर मुझे 

@andaaz  पर  फॉलो करे 

बने  रहिये  किताबे  और  किस्से  के  साथ। ...  किताबो के   ऐसे  ही  दिलचस्प  किस्से  जानने  के लिये  आज  के  लिये  नमस्कार। 



शनिवार, 14 जुलाई 2018

"Filmsandbooks"

किताबे और  किस्से में आप  सब  का स्वागत  हैं.......


दोस्तों ये तो हम सभी जानते है ज़िन्दगी  का कोई भी पड़ाव  हो हम किताबो से रुबारु हो ही  जाते  हैं, फिर चाहे वो बचपन की  "नंदन " हो  या लड़कपन  कि  "हॉफ  गर्ल  फ्रेंड" कभी कहानियों की, दुनिया में  डूबने का मन हो तो  प्रेमचंद्र की कहानियों में गोते लगाते हैं और अगर प्यार में  हो गुलज़ार के संग थोड़ा गुलजार हो जाते हैं और जैसे जैसे वक़्त बदलता हैं हमारी किताबें भी अपना स्वारुप बदल लेती हैं।...



अपने इस ब्लॉग से मैं आपको बताऊँगी की वो कागज की दुनिया आज के डीजिटल युग से कितनी अलग हैं" 

यहाँ मै हर उस किताब के किस्से बताऊँगी जो मैंने पढ़ी हैं और आपको एक बार  फिर कागज़ की उस दुनिया में ले जाने की  कोशिश करुँगी जहाँ एक दोस्त बिन कुछ बोले बहुत कुछ बोल जाता है , और उसी दोस्त को हम बहुत पीछे छोड़ आये हैं ||




जब मैं भटक जाती हुँ तो, 
किताबे मुझे रास्ता दिखाती  है ।
जब  उदास होती हूँ  तो किताबें,
ख़ुशी  बन जाती है।... 

बस  इतना ही रिशता हैं  मेरा  उस  कागज  की दुनिया सें....

अगर  आपको भी  किताबे  पढ़ने  का  शौक है तो जुड़े रहिये किताबे  और किस्से  के   साथ...