" सेवासदन मुंशीप्रेम चंद"
सबसे पहले आपसे बहुत बहुत माफ़ी मांगना चाऊंगी जो बहुत दिनों से मेरे नये पोस्ट का इंतज़ार कर रहे हैं, और मैं उन्हें लगातार इंतज़ार करवा रही हूँ।
दोस्तों आज हम फ़िर हाज़िर हुए हैं अपनी नयी किताब के साथ , क़िताबे और किस्से के कुछ और किस्सों के साथ जैसा की आप सब जानते हर बार हम हिंदी के महान लेखकों की किताबों की व्याख्या करते हैं और आपसे ये इच्छा जाहिर करते है की आप भी उस पुस्तक को उसी रस और आनन्द के साथ पढ़े जो आनन्द मुझे अपने नये पोस्ट को लिखने में आता हैं।
दोस्तों आज हम फ़िर हाज़िर हुए हैं अपनी नयी किताब के साथ , क़िताबे और किस्से के कुछ और किस्सों के साथ जैसा की आप सब जानते हर बार हम हिंदी के महान लेखकों की किताबों की व्याख्या करते हैं और आपसे ये इच्छा जाहिर करते है की आप भी उस पुस्तक को उसी रस और आनन्द के साथ पढ़े जो आनन्द मुझे अपने नये पोस्ट को लिखने में आता हैं।
मैं किताब को पहले बहुत ही आनन्द के साथ पढ़ती हूँ उसके बाद ही आपके साथ साँझा करती हूँ। तो दोस्तों मेरा इतना तो हक़ बनता है की आपसे बोलो के मेरे रिव्यु पर अपनी प्रतिक्रिया देना न भूले , कहाँ ? अरे भाई कमेंट बॉक्स में यही तो एक जरिया है जो मेरा आपका और हम सबका रिश्ता और मज़बूत बनाता हैं।
ओके , सॉरी अगेन आई नो यू आर वेटिंग फ़ॉर ओल्ड बुक रिव्यु इन न्यू स्वाति ' स स्टाइल चालो अच्छा अब बता ही देती हूँ आज किस क़िताब के बारे में बताऊँगी। . वैसे ये मजाक ही था क्योकि इंतज़ार की कोई बात ही नहीं थी क्योंकि हमने तो पोस्ट का नाम ही ऐसा रखा है की आपको जाने कब पता चल चुका होगा और अभी आपको मेरे ब्लॉग में बने रहने का भी यही कारण था। .वैसे अब इतना समय रुक गये हो तो दो मिनट और सही।
.आज की किताब का क़िस्सा है कहानियों के लेजेंड और कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद्र जी के द्वारा लिखी गयी उपन्यास "सेवासदन " सेवासदन एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपने द्वारा धिक्कारे जाने पर और उसे जीवन यापन का और कोई मार्ग न मिलने पर वो एक वैश्या की जिंदगी अपनाने में मजबूर हो जाती है।
वैसे तो उसे उसके घर के सामने रहने वाली वैश्या के कपड़ो उसके रहन सहन ने हमेशा ही प्रभावित किया था लेकिन उसने कभी भी ऐसा नहीं सोचा था की एक वक़्त ऐसा भी आयेगा की उसे मजबूरन वैश्य की जिंदगी जीने के लिये मजबूर होना पड़ेगा।
उसकी जिंदगी में कुछ ऐसा हो रहा था। .. की उसको दूर के ढोल सुहावने लग रहे थे परन्तु कुछ चीज़े बाहर से जैसी दिखती है वैसी होती नहीं , इस बात का इल्म उसे तब हुआ जब वो उस पेशे में रंग चुकी थी, लेकिन एक बात जो बहुत ही बेहतरीन रही की वक़्त रहते उसने खुद को बाहर ही नहीं निकाला अपितु उसने वैश्या की लड़कियों को पढ़ाने और उनकी देख रेख करने का जिम्मा अपने सर पर ले लिया। ... कहानी में बहुत से उतार चढ़ाओ है उस समये के समाज और लोगो को प्रेमचंद्र जी ने बखूबी क़िताब में उतारा हैं।
पूरी कहानी जानने के लिए पढ़े "उपन्यास सेवासदन "और किताबो के और किस्से जानने के लिये बने रहिये मेरे यानी किताबे और किस्से के संग।
पूरी कहानी जानने के लिए पढ़े "उपन्यास सेवासदन "और किताबो के और किस्से जानने के लिये बने रहिये मेरे यानी किताबे और किस्से के संग।
आप इस किताब को अमेज़न , फ्लिपकार्ट ,गूगल ,प्रतिलिपि एवम अन्य साइट्स में पढ़ सकते है।
मेरे द्वारा लिखी गई कहानियों को पढ़ने के लिए नीचे दिये लिंक पर क्लिक करे मैंने अपने नये ब्लॉग को आपकी सुविधा के अनुसार हर तरह की कहानियाँ को लिखने का प्रयास किया हैं एक बार लिंक पर क्लिक जरूर करे -
आज इस पोस्ट के साथ एक खुशखबरी भी देना चाहूँगी की जल्द ही मैं अपने नये ब्लॉग के साथ नये रूप में मिलूंगी।
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